Thu, 08 06, 2026
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नारा-ए-तकबीर’ से दुश्मन को चौंकाया, 18 हजार फीट पर फहराया तिरंगा:

कारगिल विजय के 27 वर्ष: झुंझुनूं के दो वीर सैनिकों ने सुनाई खालूबार की जंग, बोले- मोर्चे पर न जाति थी, न भाषा... सिर्फ भारत था

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झुंझुनूं। कारगिल विजय दिवस की 27वीं वर्षगांठ पर कारगिल युद्ध में शामिल रहे झुंझुनूं के दो वीर सैनिकों ने 18 हजार फीट की ऊंचाई पर लड़ी गई उस ऐतिहासिक लड़ाई की यादें साझा कीं, जहां भारतीय सैनिकों ने विषम परिस्थितियों में दुश्मन को परास्त कर खालूबार रिज पर तिरंगा फहराया था।

22 ग्रेनेडियर्स के रिटायर्ड ऑनरेरी कैप्टन टीपू सुलतान खान और रिटायर्ड नायब सूबेदार जंगशेर खां ने बताया कि पाकिस्तानी सेना ऊंची चोटियों पर मजबूत स्थिति में थी, जबकि भारतीय जवानों को भारी हथियारों और सीमित गोला-बारूद के साथ नीचे से ऊपर चढ़कर हमला करना पड़ा। जवानों के कंधों पर करीब 50-50 किलो वजन था, लेकिन हौसले बुलंद थे।

उन्होंने बताया कि मुस्लिम कंपनी ने रेजिमेंट के नारे "सर्वदा शक्तिशाली" के साथ हमला शुरू किया और दुश्मन के करीब पहुंचते ही "नारा-ए-तकबीर... अल्लाह-हू-अकबर" का उद्घोष किया। इससे पाकिस्तानी सैनिक भ्रमित हो गए और भारतीय सेना ने इस मनोवैज्ञानिक बढ़त का लाभ उठाकर बैनेट फाइट और तोपखाने की मदद से 5287 मीटर ऊंची खालूबार रिज पर कब्जा कर तिरंगा फहरा दिया।

'मेरे लिए सबसे बड़ी शादी युद्ध जीतकर लौटना था'

रिटायर्ड नायब सूबेदार जंगशेर खां ने बताया कि कारगिल रवाना होने के समय उनके साले की शादी थी। परिवार और ससुराल से लगातार बुलावा आ रहा था, लेकिन उन्होंने जवाब भेजा कि "मेरे लिए सबसे बड़ी शादी यही है कि मैं युद्ध जीतकर लौटूं।"

उन्होंने बताया कि युद्ध के दौरान उनके शहीद होने की झूठी खबर गांव तक पहुंच गई थी, जिससे परिवार सदमे में आ गया। हालांकि उन्होंने साथियों के साथ मोर्चा संभाले रखा और दुश्मन को पीछे हटने पर मजबूर कर दिया।

जब अपने ही जवानों के पास कराना पड़ा बोफोर्स से फायर

ऑनरेरी कैप्टन टीपू सुलतान खान ने बताया कि लड़ाई के दौरान एक समय ऐसा भी आया जब गोला-बारूद लगभग खत्म हो गया और दुश्मन लगातार जवाबी हमला कर रहा था। ऐसे हालात में कंपनी कमांडर को SOS फायर का आदेश देना पड़ा।

उन्होंने बताया कि इसका अर्थ था अपने ही जवानों की लोकेशन के बेहद करीब बोफोर्स तोपों से गोलाबारी कराना, ताकि दुश्मन को रोका जा सके। उस समय सैनिकों के पास सुरक्षित स्थान पर पहुंचने के लिए केवल 25 से 30 सेकंड का समय होता है।

टीपू सुलतान खान ने कहा कि उन कुछ सेकंड में पूरा जीवन आंखों के सामने घूम जाता है, लेकिन सैनिक के मन में सिर्फ एक ही भावना रहती है—देश की रक्षा।

देशभर से मिली हौसले की ताकत

दोनों सैनिकों ने बताया कि कारगिल युद्ध के दौरान देशभर से जवानों के लिए राखियां, चिट्ठियां और शुभकामनाएं पहुंचती थीं, जो उनका मनोबल बढ़ाती थीं। टीपू सुलतान खान ने अपने चाचा का पत्र भी याद किया, जिसमें लिखा था—"घबराना मत बेटे, जरूरत पड़े तो मुझे भी बुला लेना।"

'मोर्चे पर सिर्फ भारत था'

दोनों वीर सैनिकों ने कहा कि कारगिल युद्ध ने उन्हें सबसे बड़ा संदेश दिया कि युद्धभूमि पर न कोई जाति होती है, न धर्म और न भाषा। वहां सिर्फ भारत होता है और मातृभूमि की रक्षा का संकल्प।

उन्होंने कहा कि खालूबार की चोटी पर तिरंगा लहराते देखने का क्षण उनके जीवन का सबसे गौरवपूर्ण पल था, जिसे वे आज भी कभी नहीं भूल सकते।

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