चूरू के उद्योग की पहचान। काठ और पत्थर से रही है। लेकिन अब दोनों ही उद्योग मंदी की मार झेल रहे हैं। यहां पर तराशा हुआ मुंह बोलता पत्थर कभी आसपास के क्षेत्र के साथ हरियाणा से पंजाब तक जाता था। लेकिन अब यह उद्योग सिमटता जा रहा है। इस कारोबार को संवारने के लिए यहां के व्यवसाइयों ने इसमें नवाचार भी किए, लेकिन कोराना संक्रमण के बाद यह कारोबार मंदी से उबर नहीं पाया। औद्योगिक क्षेत्र सहित शहर में अनेक जगह पत्थर चोखट निर्माण के कारखानासें मंय अब छेनी-हथौड़ी की आवाज कभी कभार ही सुनाई देती है।
भीलवाड़ा और करौली के पत्थर पर उकेरी गई कारीगरी
एक जमाना था यहां इमारती पत्थर का व्यवसाय करनेवाले कोटा, भीलवाड़ा व निम्बाहेड़ा के पत्थर सिलपट्टियों को काटकर सिलावट द्वारा चौखट बनाते थे। जो सपाट हुआ करती थी। इसके बाद जोधपुरी पट्टी की चोखट ने कारोबार ने यहां गति पकड़ी। आधुनिक सुविधाओं से युक्त मकान बनने के शुरू हुए प्रचलन के बाद काठ की बनने वाली चोखट के विकल्प में करौली के पत्थर की चौखट बनी बनाई आने का यहां सिलसिला शुरू हुआ। इसके बाद यहां भी करोली के पत्थर की चौखट बनने लगी। मांग बढ़ी तो कई कारोबारियों ने यहां कट्टर मशीन लगाकर कारोबार शुरू कर दिया।
महंगा काठ और दीमक बनी समस्या
कोई दो दशक पूर्व आधुनिक सुविधा और साज-सज्जा युक्त मकान बनाने के बढ़े प्रचलन में काठ की चौखट लगाना न केवल महंगा पडऩे लगा, बल्कि काठ के दीमक लगने की समस्या भी गहराई। इसलिए विकल्प के तौर पर करौली के पत्थर की चौखट उद्योग विकसित हुआ। करौली पत्थर की चौखट कोई महंगी तो अधिक नहीं रही, लेकिन करौली का पत्थर हल्का माना गया। नमी नहीं सहने के कारण करौली पत्थर के समय पाकर खराब होने की शिकायतें आई तो फिर एक नवाचार हुआ और जोधपुर के पत्थर की चौखट बनने लगी।
ग्रेनाइट और मार्बल की चौखट भी बनती है यहां
जोधपुर पत्थर की चौखट के साथ ही गत तीन चार वर्षों से मार्बल और ग्रेनाइट पत्थर की चौखट का उत्पाद भी यहां चूरू के औद्योगिक क्षेत्र में शुरू हुआ। हालांकि अभी तक ज्यादा चलन जोधपुरी पत्थर चौखट का ही है, लेकिन मंदिर और धार्मिक केन्द्र के लिए बनने वाले भवनों में मार्बल-ग्रेनाइट पत्थर की चौखट प्रचलन में आ रही है। महंगे मकानों में भी अब मार्बल-ग्रेनाइट पत्थर की चौखट लगाने का प्रचलन बढ़ रहा है।
कला ऐसी की मुंह बोलते हैं यहां पत्थर
चूरू में जोधपुर के पत्थर का चौखट उद्योग शुरू हुआ तो उद्यमियों को कुछ साल संघर्ष करना पड़ा, लेकिन बाद में चूरू औद्योगिक क्षेत्र में स्थापित हुए पत्थर चौखट उद्योग ने गति पकड़ ली। यहां पर दस से अधिक फेक्ट्रियां लग गई। पत्थर व्यवसाय में काम करनेवाले कारीगरों को भी इससे संजीवनी मिली। कटर मशीनों के माध्यम से बननेवाली पत्थर चौखट को कलात्मक स्वरूप प्रदान किया गया तो वह मुंह बोलने लग गई। मकान के मुख्य द्वारा के साथ मंदिरों और सार्वजतिक स्थलों के लिए यहां चौखट खास बन गई। चूरू का पत्थर चौखट का उत्पाद न केवल जिले में बल्कि हरियाणा पंजाब तक जाने लगा, लगा, लेकिन अब प्रतिस्पर्धा और बाजार में आई मंदी के कारण अब उद्यमियों के सामने नई चुनौतियां खड़ी हो गई है।
रो-मेटेरियल हुआ महंगा
क्वालिटी डाउनउद्यमियों की माने तो पिछले दशकों की तुलना में अब रो-मेटेरियल महंगा हो गया है। जोधपुर से आनेवाले पत्थर की क्वालिटी भी कमजोर होने का कारण उद्यमियों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
