हस्त कला के दम पर पूरे देश में विशेष पहचान रखने वाला खजवाना का जूती उद्योग सरकारी संरक्षण के अभाव में दम तोड़ने लगा है। लम्बी चलने व मजबूत आकार के कारण किसान वर्ग की पहली पसंद बनकर उभरा खजवाना का यह उद्योग आधुनिकता के साथ वेंटीलेटर पर चला गया है।
एक जमाना था जब जयपुर और जोधपुर राज्य के लोग पैदल चलकर खजवाना जूती खरीदने आया करते थे। आए भी क्यों न इस जूती की खासियत ही कुछ ऐसी ही थी कि एक बार बनवाने के बाद यह कई साल चलती थी और दिखने में भी बहुत आकर्षक लगती थी। किसान परिवार के लोगों को खेती के काम के दौरान ऐसी ही जूती की तलाश रहती थी जो लम्बी भी चले और दिखने में भी सुन्दर हो। नई जूती को स्थानीय भाषा में पगरखी व मोजड़ी कहते हैं। जबकि पूरानी जूती को खुल्डा के नाम से पुकारा जाता है।
वर्ष 1950 के करीब जिले के बड़ीखाटू कस्बे से विस्थापित होकर खजवाना पहुंचे रेगर समाज के लोगों ने खजवाना में जूती उद्योग की शुरुआत की। उस समय खजवाना की जूती की तूती बोलती थी। जोधपुर दरबार के कई राजवी व दरबारी यहां की जूती मंगवाकर पहनते थे, लेकिन समय के साथ चमड़ा उद्योग पर आधुनिकता का साया छाने लगा। पिछले एक दशक से इस उद्योग से जुड़े हस्तशिल्प कारीगरों की आजीविका पर संकट खड़ा हो गया है। नई पीढ़ी पुश्तैनी काम को छोड़कर सब्जी बेचने को मजबूर हो गई है।
नागौरी जूती बनाने के लिए गुजरात से कच्चा चमड़ा खरीदा जाता है। उस कच्चे चमड़े को 10 से 15 दिन तक नमक के पानी में भीगोकर रखते हैं। उससे चमड़ा मुलायम हो जाता है। मुलायम चमड़े पर कंटाला नामक सूखी झाड़ी को पीसकर बनाया पाउडर छिड़ककर चार से पांच दिन के लिए छोड़ दिया जाता है। उसके बाद छूरी से चमड़े के बाल उतारे जाते हैं। बाल उतारने के बाद बाजरे के आटे से बनी राबड़ी में चमड़े को भिगोया जाता है। चार से पांच दिन भीगने के बाद चमड़े में चमक आ जाती है तथा चमड़े की उम्र भी बढ़ जाती है। अब इस चमड़े को फिर से पानी में भीगोकर बबूल की पीसी हुई छाल (रांग) छिड़कते हैं। इससे एक सप्ताह में चमड़ा गहरा रंग ले लेता है। इस प्रक्रिया को कसाव देना कहा जाता है। अंत में चमड़े पर अरंडी का तेल लगाकर छोड़ दिया जाता है जिसे तेलछाब करना कहते हैं। इस प्रकार यह चमड़ा जूती बनाने के लिए तैयार हो जाता है। अब इस चमड़े से रेगर समाज के पुरुष पगरकी तैयार करते हैं व महिलाएं कशीदा निकालती है। यह सम्पूर्ण कार्य बिना किसी मशीन की सहायता से होता है। इसलिए इसमें मेहनत बहुत अधिक लगती है। जिसके मुकाबले आमदनी बहुत कम मिलती है।
