कड़ी मेहनत एवं मशक्कत करने के बावजूद किसानों को इस बार खरीफ की उपज लाभ नही दे रही है। क्षेत्र का किसान पहले से ही बेमौसम की बारिश से अपनी मूंग मोठ, ज्वार, बाजरा आदि की उपज के साथ साथ मवेशियों का चारा भी गंवा बैठा है। अब जब कपास के बिनोले सफेद सोना उगलने लगे है, तो भाव की मंदी से किसान को वाजिब दाम भी नही मिल पा रहे है। गत वर्ष जहां कपास नौ से दस हजार रूपए प्रति क्विंटल निलामी बोली पर बिका वहीं इस बार नया कपास मंडी में आने के साथ ही आठ हजार रूपए प्रति क्विंटल पर बिका और इन दिनों वही कपास छह हजार पांच सौ से लेकर सात हजार पांच सौ रूपए प्रति क्विंटल की निलामी बोली पर बिक रहा है।
व्यापारियों की माने तो इस बार कपास की आवक बाहरी देशों से होने के कारण तथा स्थानीय कपड़ा मिलों की ओर से कपास गाठों का उठाव नही होने से कपास की मांग नहीं के बराबर है। ऐसी स्थिति में व्यापारी भी कपास की खरीदी कम कर रहा है। इधर जिन किसानों इस बार कपास की बुआई की है, उनमें से नेमाराम आगलेचा ने बताया कि समय पर बारिश नहीं होने से खरीफ की फसल उजड़ गई लेकिन कपास की फसल से अच्छी आमदनी होने की आस बंधी थी। लेकिन मंडी में कपास के पहुंचते ही यह आशा निराशा में बदल गई। एक अन्य किसान नेमाराम पटेल के अनुसार इस बार जितना खर्चा कपास की फसल लेने से हुआ उससे आधी भी आवक नही हुई है। यानि कपास की बुवाई इस बार घाटे का सौदा साबित हुई।
सूती धागे की मांग कम
कपास की बड़ी मंडी सुमेरपुर के व्यापारी गुलाबसिंह ने बताया कि कपास की कीमतों मे गिरावट का कारण घरेलू और अन्तराष्ट्रीय बाजारों मे कपास की कम मांग है। यहा तक कि सूती धागे की मांग भी कम है। मंडी में अध्यक्ष रह चुके महेन्द्रसिंह राठौड़ बताते है कि सूती धागे और कपड़ा निर्माण ईकाइया स्थापित क्षमता के पचास प्रतिशत पर काम कर रही है ऐसे मे किसान अगर कपास खरीददारों से खरीदारी की उम्मीद कैसे कर सकते है। बावजूद उन्हें उम्मीद है कि कपास की मांग फिर से बढ सकती है और कीमत भी किसानों को कुछ राहत मिलेगी। लेकिन तब तक किसानों को वर्तमान भावों से खुश होना पड़ेगा।
