अबकी बार धान की अच्छी पैदावार हुई। किसानों को उचित मूल्य मिलने का इंतजार था। लेकिन सरकारी तंत्र की लापरवाही की वजह से धान की सरकारी खरीद शुरू नहीं हो पाई। इससे किसान न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी कम रेट पर धान की फसल को बेचने को मजबूर हो रहे हैं। स्थिति यह है कि एमएसपी के नाम पर सरकारी तंत्र की जुबान में ताला लग गया है। जबकि पराली प्रबंधन के नाम पर अब किसानों को चेताया जा रहा है। सरकारी तंत्र ने पराली जलाने वाले किसानों पर 15000 रुपए तक का जुर्माना लगाने की चेतावनी दी है। इससे किसान बेचैन हो रहे हैं। अनुमान के मुताबिक जिले में 20-25 लाख क्विंटल पराली का उत्पादन अनुमानित है। कृषकों द्वारा धान फसल कटाई के तुरंत बाद् खेत खाली कर गेहूं की बिजाई करने के लिए धान फसल अवशेष (पराली) को जलाने की प्रवृत्ति है। उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित आयोग की ओर से निर्देश दिए हैं कि धान की कटाई के दृष्टिगत जिले में फसल अवशेषों को नहीं जलाने के संदर्भ में कार्यवाही सुनिश्चित की जाए। इस सिलसिले में जिला कलक्टर रूक्मणि रियार ने निर्देश दिए हैं कि धान फसल कटाई उपरांत फसल अवशेष (पराली) को नहीं जलाने के लिए कृषकों को प्रेरित किया जाए। फसल अवशेष प्रबंधन के लिए तकनीकी जानकारी दी जाए। ताकि पर्यावरण प्रदूषित नहीं हो।
किसान गोष्ठियों का होगा आयोजन
कृषि विभाग के संयुक्त निदेशक डॉ. रमेश चंद्र बराला ने बताया कि कृषकों को प्रेरित करने के लिए धान उत्पादक क्षेत्र की प्रत्येक पंचायत समिति पर पंचायत समिति स्तरीय किसान गोष्ठियों का आयोजन आगामी दो दिवस में किया जाएगा। तदोपरान्त प्रत्येक धान उत्पादक ग्राम पंचायत मुख्यालयों पर ग्राम पंचायत स्तरीय किसान गोष्ठियों का आयोजन किया जाएगा।
किसान गोष्ठियों में फसल अवशेष (पराली) के समूचित प्रबंधन के लिए फसल अवशेष को पशुओं के चारे के रूप में उपयोग करने को लेकर प्रेरित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त पराली की गांठ बनाकर बायोमास आधारित पावर प्लांटों में उपयोग में लेने के लिए एवं गोशालाओं में चारे के रूप में उपयोग में लेने को किसानों को प्रेरित किया जाएगा।
मिट्टी के लिए भी ठीक नहीं
जिले की मिट्टी के पीएच मान में लगातार उतार चढ़ाव आ रहा है। खेत में धान की कटाई के बाद पराली को जलाने की प्रवृत्ति है। इससे मिट्टी में पाए जाने वाले मित्र कीट भी जल जाते हैं। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति प्रभावित हो रही है। बेहतर इसी में है कि किसान पराली का प्रबंधन करना सीखें। राज्य व केंद्र सरकार को भी पराली प्रबंधन को लेकर विशेष प्रोजेक्ट बनाना चाहिए। ताकि स्थानीय स्तर पर किसान पराली का उपयोग कर सकें। पशुओं के लिए पशुचारा तैयार करने का बेहतर विकल्प हो सकता है। इसके लिए पशुपालन विभाग या डेयरी जैसी संस्थाओं को प्रोजेक्ट बनाने की पहल करनी चाहिए। गंगमूल डेयरी की ओर से जिला मुख्यालय पर संचालित फोडर प्लांट की क्षमता बढ़ाने की दिशा में भी काम करने की जरूरत है।
पराली जलाने पर इतना जुर्माना
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल बोर्ड, नई दिल्ली द्वारा जारी निर्देश अनुसार फसल अवशेष जलाने पर दो एकड़ क्षेत्रफल तक 2500 रुपए, 2 से 5 एकड़ क्षेत्रफल तक 5000 रुपए तथा 5 एकड़ से अधिक क्षेत्रफल में फसल अवशेष जलाने पर 15000 रुपए पर्यावरण क्षति पूर्ति के रूप में जुर्माना लगाने का प्रावधान किया गया है। कृषि विभाग स्तर पर कृषकों से अपील की गई है कि धान फसल कटाई उपरान्त फसल अवशेष, पराली जलाने की बजाय उचित प्रबंधन करें। ताकि पशुओं के लिए चारे की किल्लत भी कम हो सके एवं पर्यावरण को प्रदूषित होने से भी बचाया जा सके।
