Thu, 08 06, 2026
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अमरूदों के प्रति किसानों का घटा रूझान:

एक दशक तक जिले में लगातार बढ़ा था अमरूद का क्षेत्रफल: अब 3 वर्ष से कम हो रहा रकबा

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 करौली जिले में पिछले वर्षों में अमरूद की पैदावार का बढ़ा रकबा अब धीरे-धीरे कम होने लगा है। करीब एक दशक से जिले के विभिन्न हिस्सों में लहलहाता रहा अमरूद अब किसानों की आंखों की किरकिरी बनता जा रहा है। शायद यही वजह है कि साल दर साल जिले में अमरुद के उत्पादन में कमी आने के साथ ही इसका रकबा कम हो गया है। बीते चार वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो अमरूद की पैदावार का रकबा बढ़ने के बजाए कम हो गया है। इसके पीछे मुख्य कारण बीते वर्षों में अमरूद के कमजोर भाव रहे हैं। इसके चलते किसानों का इससे मोहभंग होने लगा है। नतीजतन गत वर्ष और इस वर्ष भी अनेक किसानों ने अमरूद्ध की पैदावार से मुंह मोड़कर दूसरी खेती की ओर रुख किया है। गौरतलब है कि जिले में वर्ष 2010-11 के बाद से एक साथ अमरूद की पैदावार के प्रति किसानों का रूझान बढ़ गया।
वर्ष दर वर्ष अमरूद के उत्पादन का रकबा बढ़ता गया, जिससे उम्मीद की गई थी कि जिले को अमरूद की पैदावार के लिए नई पहचान मिलेगी, लेकिन पिछले तीन वर्ष से लगातार कम हो रहे अमरूद के क्षेत्रफल से यह उम्मीद धूमिल हो रही है। अनेक किसानों ने बगीचों में लगे अमरूद के पेड़ों को काट दिया है।
सपोटरा इलाके में सर्वाधिक रकबा: जिले के सपोटरा इलाके में सर्वाधिक क्षेत्रफल में अमरुद के बगीचे लगे हैं। सपोटरा कस्बे के आसपास से लेकर हाड़ौती इलाके तक अमरूद की बम्पर पैदावार होती रही है। इसके अलावा सूरौठ, पटोंदा, खेड़ा आदि इलाकों में भी अमरूद के बगीचे लगे हैं। लेकिन कोरोना काल के दौरान अमरूद के भाव औंधे मुंह गिर गए। नतीजतन किसानों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा। उस समय अमरूदों का दूसरे स्थानों पर परिवहन थम सा गया और व्यापारियों ने अमरूद ले जाने में रुचि नहीं दिखाई। ऐसे में अमरूद बागों में ही रह गए, जिससे किसानों को नुकसान हुआ। इसके बाद से ही न तो अमरूद के अच्छे भाव मिले और न ही रकबा बढ़ सका।
वर्ष दर वर्ष यूं कम हुआ रकबा
जिला उद्यानिकी विभाग के आंकड़ों पर नजर डालें तो वर्ष 2020-21 में जहां जिले में 720 हैक्टेयर क्षेत्रफल में अमरूद के बगीचे लहलहा रहे थे, वहीं अगले वर्ष 2021-22 में यह रकबा घटकर 660 हैक्टेयर क्षेत्रफल में रह गया। इसके बाद वर्ष 2022-23 में अमरूद के बगीचों का क्षेत्रफल कम होकर 630 हो गया, जबकि इस वर्ष यह रकबा और भी कम होकर करीब 550 हैक्टेयर क्षेत्रफल तक ही रह गया है।
बीते चार वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो अमरूद की पैदावार का रकबा बढ़ने के बजाए कम हो गया है। इसके पीछे मुख्य कारण बीते वर्षों में अमरूद के कमजोर भाव रहे हैं। इसके चलते किसानों का इससे मोहभंग होने लगा है। जिससे पैदावार भी कम होने लगी है।

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