देश में प्रदेश पिछड़े क्षेत्र में गिना जाता रहा, किंतु मतदाताओं की राजनीतिक दृष्टि से हमेशा आगे ही रहा है। चुनावों में मतदाताओं ने अपने निर्णय से कई बार चौंकाया तो कई बार उम्मीदवारों को विश्वास की थपकियां भी देता रहा है। मतदाताओं ने कुछ सीटों पर हर चुनाव में परिणाम बदल दिया तो कुछ पर भरोसा कायम रखा। अब एक बार फिर चुनावी रण तैयार है। ऐसे में मतदाता रिवाज बदलेंगे या बनाए रखेंगे, यह भविष्य के गर्भ में छिपा है। मतदाताओं का मानस समय अनुसार बदलता रहा है। वर्ष 2003 से अब तक हुए चुनाव के परिणाम में यह स्पष्ट रूप से दिखाई भी दिया है। इस बार मतदाताओं के मन में क्या है ? इस प्रश्न का उत्तर चुनाव परिणाम के साथ ही सामने आएगा।
तीसरा मोर्चा हुआ पस्त
विगत दस वर्षों में दो चुनाव हुए हैं, जिसमें तीसरा मोर्चा पस्त हो गया है। 2013 के बाद मुख्य मुकाबला भाजपा और कांग्रेस में ही रहा है। हालांकि 2013 व 18 में हुए चुनाव में जनता दल, बसपा, सपा, बीटीपी ने भी चुनाव लड़ा, किंतु वह निर्णायक साबित नहीं हो पाए। इस बार के चुनाव में एक और नई पार्टी का उदय हुआ है और उसका भविष्य भी मतदाता तय करेंगे।
