जयपुर। राजस्थान में पंचायत एवं नगरीय निकाय चुनाव समय पर नहीं कराए जाने को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने बुधवार को राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग के प्रति कड़ा रुख अपनाया। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एस.पी. शर्मा और न्यायमूर्ति संजीत पुरोहित की खंडपीठ ने चुनाव टालने संबंधी राज्य सरकार के प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट कहा कि यदि राज्य निर्वाचन आयोग चुनाव कराने में सक्षम नहीं है तो अदालत किसी अन्य सक्षम व्यक्ति को चुनाव कराने की जिम्मेदारी सौंपने पर विचार कर सकती है। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से कहा कि वह अदालत को कठोर आदेश पारित करने के लिए मजबूर न करे। कोर्ट ने राज्य निर्वाचन आयोग और ओबीसी आयोग की कार्यप्रणाली पर भी नाराजगी जताते हुए मौखिक टिप्पणी की कि यदि संबंधित अधिकारी और सदस्य अपने दायित्वों का निर्वहन करने में सक्षम नहीं हैं तो उनकी जगह सक्षम व्यक्तियों की नियुक्ति की जानी चाहिए। अदालत ने पूर्व आदेशों की पालना नहीं होने को गंभीरता से लेते हुए राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त राजेश्वर सिंह तथा ओबीसी आयोग के सदस्य सचिव को गुरुवार को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर जवाब देने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट यह जानना चाहता है कि उसके स्पष्ट निर्देशों के बावजूद अब तक चुनाव प्रक्रिया क्यों शुरू नहीं की गई। राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजेन्द्र प्रसाद ने अदालत को बताया कि पंचायत और निकाय चुनावों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि सरकार अदालत के आदेशों की अवहेलना नहीं कर रही है, लेकिन ओबीसी आयोग की रिपोर्ट नहीं मिलने के कारण आरक्षण का अंतिम वर्गीकरण नहीं हो पाया है। महाधिवक्ता ने बताया कि ओबीसी आयोग ने इस बार 14 अगस्त तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने का आश्वासन दिया है। इसलिए सरकार को चुनाव स्थगित करने के लिए अंतिम अवसर दिया जाए। पूर्व विधायक संयम लोढ़ा की ओर से अधिवक्ता पुनीत सिंघवी ने अदालत में कहा कि सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग दोनों ही न्यायालय के आदेशों की अनदेखी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि हाईकोर्ट अपने 22 मई के आदेश में स्पष्ट कर चुका है कि यदि निर्धारित समय तक ओबीसी आयोग की रिपोर्ट नहीं आती है तो उसका इंतजार किए बिना चुनाव कराए जाएं। इसके बावजूद आयोग और सरकार लगातार रिपोर्ट का हवाला देकर चुनाव टाल रहे हैं, जो न्यायालय के आदेश की अवमानना है। दूसरे याचिकाकर्ता गिर्राज सिंह देवंदा की ओर से अधिवक्ता प्रेमचंद देवंदा ने दलील दी कि सरकार द्वारा चुनाव टालने के लिए प्रस्तुत प्रार्थना पत्र विधिसम्मत नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 243(क) के अनुसार पंचायत एवं निकाय चुनाव कराने की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयोग की है। ऐसे में चुनाव कराने के लिए सरकार नहीं बल्कि आयोग जवाबदेह है। गौरतलब है कि राजस्थान हाईकोर्ट पहले राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को 15 अप्रैल तक पंचायत एवं निकाय चुनाव कराने के निर्देश दे चुका था। बाद में सरकार और आयोग की ओर से समय बढ़ाने का अनुरोध किया गया, जिस पर अदालत ने राहत देते हुए 31 जुलाई तक हर हाल में चुनाव कराने का आदेश दिया था। इसके साथ ही ओबीसी आयोग को 20 जून तक अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के निर्देश दिए गए थे, लेकिन आयोग निर्धारित समय सीमा में रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं कर सका। अब सरकार एक बार फिर रिपोर्ट लंबित होने का हवाला देकर चुनाव टालने की मांग कर रही है। हाईकोर्ट के कड़े रुख के बाद अब गुरुवार को होने वाली सुनवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त और ओबीसी आयोग के सदस्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए हैं। उनके जवाब के आधार पर अदालत आगे की कार्रवाई तय करेगी। यदि कोर्ट संतुष्ट नहीं हुआ तो राज्य सरकार और निर्वाचन आयोग के खिलाफ सख्त आदेश पारित किए जा सकते हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त और ओबीसी आयोग के सदस्य सचिव तलब
सरकार ने मांगा अंतिम अवसर
याचिकाकर्ताओं ने बताया कोर्ट की अवमानना
पहले भी दे चुका है हाईकोर्ट समय
गुरुवार को होगी अहम सुनवाई
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पंचायत चुनाव टालने की मांग पर हाईकोर्ट का कड़ा रुख:
पंचायत-निकाय चुनाव टालने पर हाईकोर्ट सख्त, कहा- आयोग सक्षम नहीं तो किसी और से करवा देंगे चुनाव
- by रितेश पारीक
- Jul 15,2026
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