वर्तमान में बच्चों को छोटी उम्र से ही मोबाइल फोन की लत लगने लगी है। जो उनके लिए कई समस्याओं का कारण बनता जा रहा है। बच्चे मानसिक रूप से कमजोर होने लगते हैं। बच्चों की जिद से पीछा छुड़ाने के लिए माता -पिता उन्हें मोबाइल फोन थमा देते हैं। उस समय को बच्चे भले शांत हो जाए, लेकिन काफी देर तक स्क्रीन पर समय बिताने से वह दिमागी रूप से कमजोर होने लगे हैं। दुनिया भर में हुए कई रिसर्च बताते हैं कि कम उम्र में बच्चों को स्मार्टफोन देना उनके मानसिक विकास को प्रभावित करना है। ज्यादा मोबाइल गैजेट्स और टीवी देखने से बच्चों में वर्चुअल आटिज्म का खतरा बढ़ने लगा है।
क्या वर्चुअल ऑटिज्म का इलाज : वर्चुअल ऑटिज्म का कोई इलाज नहीं है। पर्सनालिटी डेवलपमेंट थेरेपी, स्पीच थेरेपी और स्पेशल एजुकेशन थेरेपी से इसे कुछ हद तक रोका जा सकता है।
लक्षण : वर्चुअल ऑटिज्म के शिकार बच्चे दूसरों से बातचीत करने से कतराते हैं। ऐसे बच्चे बातचीत के दौरान आई कॉन्टेक्ट से बचते हैं। इन बच्चों में बोलने की क्षमता का विकास काफी देरी से होता है। इन्हें लोगों से घुलने-मिलने में काफी परेशानियां होती हैं। इससे पीड़ित बच्चों का आईक्यू स्तर भी कम होता है।
बच्चों को कैसे बचाएं
ज्यादा मोबाइल उपयोग करने से बच्चों में स्पीच डेवलपमेंट नहीं हो पाता। उनका ज्यादातर समय गैजेट्स में ही बीत जाता है। व्यवहार खराब होने लगता है, कई बार वे आक्रामक भी हो सकते हैं। स्मार्टफोन से उनके सोने का पैटर्न भी बिगड़ जाता है। ऐसे में माता-पिता को बच्चों को इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से दूर रखना चाहिए।
परिजन करें प्रोत्साहित
बच्चा छोटा होने पर माता-पिता उन्हें पास बिठाकर मोबाइल फोन दिखाते हैं। बाद में बच्चों को इसकी लत लग जाती है। बच्चों को इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स से दूर रखें। उनका फोकस दूसरे कार्यों में लगाएं, स्लीप पैटर्न भी दुरुस्त करें,आउटडोर एक्टिविटीज के लिए प्रोत्साहित करें। बच्चों के सामने खुद भी फोन से दूरी बनाए रखें।
अक्सर 4-5 साल के बच्चों में वर्चुअल ऑटिज्म के लक्षण दिखाई देते हैं। स्मार्टफोन का ज्यादा इस्तेमाल या लैपटॉप-टीवी पर ज्यादा समय बिताने से उनमें बोलने और दूसरों से बातचीत करने में उन्हें परेशानी होने लगती है। यह स्थिति सवा साल से तीन साल के बच्चों में काफी दिखती है।
