Thu, 08 06, 2026
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उदयपुर में इन समाजों ने सहेज रखी है पारंपरिक गरबे की परंपरा, खेलते हैं ताली और रास गरबा:

शहर के गुजराती समाज से लेकर मोची, भट्ट मेवाड़ा, नागर समाज में बरसों से परंपरा अनुसार होते हैं गरबे, फिल्मी और रीमिक्स गानों से दूर

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उदयपुर में गरबा-डांडिया की शुरुआत होने के पीछे भी दिलचस्प कहानी है। सालों पहले इसकी शुरुआत गुजरात से आकर उदयपुर में बसे विभिन्न समाजों के परिवारों ने की और छोटे से स्तर से लेकर आज यह बड़े स्तर तक पहुंच चुका है और गली-मोहल्लों की रौनक बन चुके हैं। समय के अनुसार अब गरबा-डांडिया में कई तरह के बदलाव आ चुके हैं, लेकिन उदयपुर के कई समाज ऐसे हैं जो पारंपरिक गरबे की परंपरा निभाते हैं -
गुजराती समाज, सेक्टर 11 : बरसों से गुजराती गरबा की ही परंपरा कायम: गुजराती समाज के गरबों का आयोजन शहर के हिरणमगरी सेक्टर 11 स्थित गुजराती समाज भवन में होता है। समाज के अध्यक्ष राजेश बी मेहता ने बताया कि इस बार भी 9 दिनों तक रास गरबा का आयोजन होगा। समाज के लोग बरसों पहले उदयपुर आकर बस गए थे। वर्ष 1970 से यहां गरबे की परंपरा शुरू की। पहले ओसवाल समाज के नोहरे में समाज के गरबे किए जाते थे, लेकिन वर्ष 2006 में जब समाज के भवन का निर्माण हो गया तब से यहीं गरबे किए जाने लगे। मेहता ने बताया कि यहां गुजराती गरबे ही बजाए जाते हैं, फिल्मी गानों पर गरबे नहीं होते। यहां महिला एवं पुरुष दोनों ही हाथों से गरबे लेते हैं, जिसमें एक ताली, दो ताली, तीन ताली के गरबे होते हैं। गरबा खेलने वाले बिना जूते चप्पल के गरबे खेलते हैं। यहां मध्य में गरबी की स्थापना की जाती है। गरबी पूर्ण रूप से स्टील की बनी हुई है व 175 किलोग्राम की बनाई गई है। इसमें मां के नौ रूपों को दर्शाया गया है। पास में एक मटकी जिसको माताजी का गरबा कहा जाता है उसकी भी स्थापना करते हैं। यह मटकी बारीक-बारीक छेद वाली होती है एवं इसके अंदर घी का दीपक जलता रहता है।
गुजराती मोची समाज, भट्ट मेवाड़ा समाज : जिसके घर में खुशी उसी के बाहर होते थे, अब मंदिर के बाहर होते हैं गरबे : शहर के मोचीवाड़ा स्थित मंदिर के बाहर गुजराती मोची समाज के पारंपरिक गरबे बरसों से होते हैं। खास बात यह है कि गुजराती परंपरा के अनुसार गरबे होते हैं। मान्यताओं के अनुसार पहले जिसके घर में खुशी होती थी, उसी के घर के बाहर गरबे होते थे। लेकिन जब से समाज का मंदिर बना है, तब से पूरा समाज मंदिर के बाहर ही गरबे करता है। खास बात यह है कि पहले पांच गरबे महिलाओं द्वारा गाए जाते हैं, इसके बाद साउंड के साथ डांडियों से गरबा रमते हैं। वहीं समाज के गरबा में बाहरी व्यक्तियों का प्रवेश नहीं होता है । अंतिम दिन रात्रि को गरबा विसर्जन कर अम्बामाता के मंदिर में रखा जाता है। इसी तरह भट्ट मेवाड़ा समाज के लोग भी खुशी होने पर या मन्नत पूरी होने पर गरबे लेते हैं। घर के आंगन में भी गरबा शुरू होता है। कई लोग अखंड गरबा भी लेते हैं।

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