दीपावली त्योहार की नजदीकी के चलते कुंभकारों ने अपने अपने कार्य को ओर अधिक गति दे दी है। मिट्टी से बने आइटम जहां एक ओर शहर में बाहर से मंगवाएं जाते हैं, वही यहां के दीपक व कलश की बाहर काफी डिमांड रहती है। करीब चार दशक पूर्व बारां शहर में 125 से 150 परिवार अपने पैतृक कार्य मिट्टी के बर्तन व अन्य सामग्री बनाने से जुड़े हुए थे। मध्यकाल में बिजली के सजावटी सामानों ने इनके धंधे को चौपट जैसा कर दिया था। इस काल में कुंभकार समाज के अधिकतर परिवार अपने पैतृक कार्य को छोड़कर अन्य कार्य करने लगे। वर्तमान में समय के थपेड़ों को सहते हुए महज एक डेढ़ दर्जन परिवार ही मिटटी से बनी सामग्री बनाने का कार्य कर रहे हैं। लेकिन बीते डेढ़ दो दशक से वापस लोग अपने परम्परागत मिटटी के दीपक, कलश इत्यादि सामानों की ओर प्रेरित होने से इनके धंधे में सुधार हुआ है। शहर के लंका कॉलोनी क्षेत्र निवासी कुंभकार विष्णु प्रजापति तथा हेमराज प्रतापति ने बताया कि पूर्व में हाथ से घुमाने वाली चाक का इस्तेमाल किया करते थे। लेकिन अब मशीन की चाक का उपयोग कर रहे हैं। शहर समेत जिले व निकटवर्ती मध्यप्रदेश तक से डिमाण्ड आती है। उन्होंने बताया की यहां के बने दीपक तथा पेंटिंग वाले कलश की अधिक डिमाण्ड रहती है। उन्होंने बताया कि उनके बनाए हुए दीपक जिले के छबड़ा, अटरु, किशनगंज, रेलावन समेत कई कस्बों व गांवों में बिक्री के लिए ले जाते हैं। वही मध्यप्रदेश के श्योपुर व गुना तक इनकी डिमाण्ड रहती है। जिले के इटावा से भी खरीद के लिए खुदरा विक्रेता पहुंचते है। उन्होंने बताया कि अब तक करीब 15 हजारे से अधिक कलश भिजवाए जा चुके है।
बाहर से आती हैं मटकियां
शहर में मिटटी के दीपक व कलश तथा अन्य सामग्री अधिक बनाए जाते हैं। लेकिन मिटटी की मटकियां बनाने वाले महज दो तीन कारीगर है। जिसके चलते बाहर से मटकियां तथा मशीन से बने डिजाइनदार दिपक मंगवाए जाते हैं। मटकियां अधिकांश बारां जिले के बडोरा, गोबरचा, दीगोदपार, कोयला व मियाड़ा समेत बूंदी जिले के सीकरदा तथा मध्यप्रदेश के बावलदा एवं इंदौर से मंगवाई जाती है।
नहीं मिलती सरकारी मदद
कुंभकार विष्णु व हेमराज ने बताया कि कुंभकारों के पैतृक कार्य को संबल देने के लिए सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती। हाथ की चाक घुमाकर कुछ रुपए जमा करके मशीन की चाक लाए है। जिसके बाद काम थोड़ा आसान हुआ है। लेकिन मिट्टी के लिए परेशानी उठानी पड़ती है। घर में ही बनाई गई छोटी भट्टियों में मिटटी के आइटमो को बनाकर तपाना पड़ता है।
