एक तरफ सरकार मेक इन इंडिया सहित अन्य कार्यक्रमों के माध्यम से देश में बनने वाली वस्तुओं को खरीदने के लिए लोगों को जागरूक कर रही है, लेकिन कुटीर उद्योग सहित घरेलू उद्योग के तहत बनने वाली वस्तुओं को खरीददार नहीं मिलने से इन कार्यों में लगे लोगों का मोह भंग हो रहा है। दीपावली पर्व आने में भले ही अभी कुछ दिन शेष रहे हो लेकिन इस त्यौहार को लेकर तैयारी अब जोर पकड़ने लगी हैं। रेवदर उपखण्ड मुयालय सहित सम्पूर्ण क्षेत्रभर में मिट्टी के दीये और मटकी बनाने वाले कुम्हार समाज के लोग शीघ्रता से अपना यह कार्य पूरा करने में जुट गए हैं। अपने पुश्तैनी धंधे में जुटे इस समाज के लोगों का कहना है कि आजकल प्लास्टिक उत्पादों की वजह से युवा पीढ़ी का इस काम से मोह भंग हो रहा है। आज तकनीक के दौर में लोगों में चाइनीज एवं प्लास्टिक उत्पादों के कारण मेहनत से बनाए इन मिट्टी के दीयों का महत्व कम होता जा रहा है।
दशकों से समाज के लोग मिट्टी के बर्तन कर रहे हैं तैयार
कुम्हार समाज की ओर से मिट्टी के बर्तन बनाने के लिए उपयोग में लिया जाने वाला चाक का पहिया बड़ी मेहनत से पत्थर के कारीगरों की ओर से तैयार किया जाता है। इस पर सारे मिट्टी के बर्तन बनते हैं, लेकिन कुछ लोगों के पास अब इलेक्ट्रिक चाक है, जिसमें मेहनत कम लगती है। इस पर भी सारे मिट्टी के बर्तन बनाए जाते हैं। चाक पर अंगुलियां घुमाते ही दीपक, मटका, घड़ा, करवा, गुल्लक सहित कई अन्य उपकरण तैयार हो जाते हैं। कुम्हार समाज के लोगों ने बताया कि दिनों-दिन मिट्टी के बर्तनों की कम होती मांग चिंता का विषय है।
युवा पीढ़ी हो रही कलाकारी से दूर
युवाओं का कहना हैं कि वर्तमान में प्लास्टिक, कांच आदि के तरह-तरह के बर्तन आ गए हैं। इससे मिट्टी के बर्तनों की मांग कम है। काफी मेहनत के बावजूद मुनाफा बहुत कम है। इसलिए युवा पीढ़ी अब इस धंधे में नहीं आना चाहती। अभी मिट्टी के दीये की कीमत 2 रुपये रखी हैं, इसके अलावा धूपिया 50 रूपए, गुल्लक 70 रुपए की कीमत में बेच रहे हैं। वहीं प्लास्टिक और चाइनीज की वस्तुओं की कम कीमत के कारण मिट्टी से बने दिए एवं बर्तन की डिमांड न के बराबर है। इस काम को करने वाले लोगों को सरकार की ओर से किसी भी प्रकार से कोई प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। इस वजह से यह कला विलुप्त होती जा रही है।
लागत के हिसाब से नहीं मिल रहा मुनाफा
मिट्टी के दीपक बनाने के लिए ये एक माह पहले से ही तैयारी में जुट गए है। दीपक सहित अन्य बर्तन बनाने के लिए दूर-दराज के गांवों से मिट्टी लाते हैं। उन्हें आकार देते हैं, फिर पकाते हैं, कई बार दीपक बेकार हो जाते है दिन-रात वे मेहनत करते है। इनकी मेहनत तब साकार होगी। जब ज्यादा से ज्यादा लोग इनके तैयार किए गए मिट्टी के दीये खरीदेगा। एक दिन में एक व्यक्ति मिट्टी के 100 दिये बनाता है। वहीं एक दिए की 2 रुपये की लागत आती है। बेचने पर प्रति दीया 3 रुपये मुश्किल से बिकता है, ऐसे में 1 व्यक्ति को मात्र 100 रुपये की मजदूरी ही मिल पाती है। इस कारण सरकारी प्रोत्साहन की सत आवश्यकता है।
