ग्रामीण क्षेत्रों में दीपावली का पर्व नजदीक आने के चलते व धनलक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के दीये बनाने वाले कुम्हारों के चाक ने गति पकड़ ली हैं। वहीं उन्हें इस बार अच्छी बिक्री की उम्मीद हैं। कुम्हारों के घरों में सुबह से लेकर शाम तक पूरा परिवार मिट्टी के दीपक तैयार करने में व्यस्त नजर आ रहे हैं। वजीरपुर क्षेत्र के कुम्भकार पिंटू प्रजापत ने बताया कि घरों में मिट्टी के दीये, मटकी आदि बनाने के लिए माता-पिता के साथ हमारे बच्चे भी हाथ बंटा रहे हैं. कोई मिट्टी गूंथने में लगा हैं तो किसी के हाथ चाक पर मिट्टी के बर्तनों को आकार दे रहे हैं। वही पके हुए मिट्टी के बर्तनों को व्यवस्थित रखने का जिम्मा परिवार की महिलाएं संभाल रही हैं। मालूम हो कि दीपावली पर्व पर धन लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए मिट्टी के दीपक जलाए जाते हैं। मिट्टी गढ़कर उसे आकार देने वालों पर शायद धन लक्ष्मी मेहरबान नहीं है, जिसके चलते वे अपने परंपरागत धंधे से विमुख होते जा रहे हैं। दीपावली पर्व पर मिट्टी का सामान तैयार करना उनके लिए महज एक सीजनल धंधा बनकर रह गया हैं। अगर वे दूसरा धंधा नहीं करेंगे तो दो जून की रोटी जुटा पाना उनके लिए मुश्किल हो जाएगा।
सिर्फ दीपावली और गर्मी के सीजन में ही होती हैं कमाई
मिट्टी के दीपक बनाने वाले तेजराम कुम्भकार व पिंटू कुम्भकार का कहना है कि दीपावली और गर्मी के सीजन में मिट्टी से निर्मित बर्तनों की मांग बढ़ जाती है, लेकिन बाद के दिनों में वे मजदूरी कर किसी तरह अपना और अपने परिवार का पेट पालते हैं. सरकार की ओर से किसी तरह की सहायता नही मिल रही है। वहीं दूसरी तरफ बाजारों में इलेक्ट्रानिक्स झालरों की चमक दमक के बीच मिट्टी के दीपक की रोशनी धीमी पड़ती जा रही है। इसके चलते लोग दीपकों का उपयोग महज पूजन के लिए ही करते हैं। इस कारण उन्हें अपनी मेहनत का उचित मेहनताना नहीं मिल रहा। यही कारण है लोग इस काम को धीरे-धीरे छोड़ रहे हैं.।
