अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष (2023) में मोटे अनाज को लेकर जागरूकता बढ़ी है। हर साल 16 अक्टूबर को विश्व खाद्य दिवस (वर्ल्ड फूड डे) मनाया जाता है। आज हम देखते हैं कि जिस भोजन को हमने छोड़ दिया, उसको दुनिया ने अपनाना शुरू कर दिया है। मोटे अनाज फिर चलन में लौट आए हैं। एक स्वर से यह विचार उभरा है कि मोटे अनाज भविष्य के भोजन हैं। राष्ट्रीय स्तर पर अब किसी को संदेह नहीं रह गया है कि मोटे अनाज का उत्पादन, खपत, प्रसंस्करण, निर्यात और इसमें प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल बढ़ना तय है। मोटे अनाज केवल भविष्य ही नहीं हैं, मोटे अनाज का समृद्ध इतिहास रहा है। मोटे अनाज में मुख्य तौर पर ज्वार, बाजरा, महुआ, जौ, कोदो, सांवा, बाजरा, कुटकी, कांगनी जैसे अन्न शामिल हैं। इन्हें श्री अन्न भी कहते हैं। श्री अन्न भारत और दुनिया के लोगों द्वारा खेती और उपभोग किए जाने वाले सबसे शुरुआती अनाजों में से एक है। साल 2023 को अंतराष्ट्रीय मोटे अनाज (मिलेट्स) वर्ष के रूप में मनाया जा रहा है, इसका असर भी जगह-जगह दिखने लगा है। भारत मिलेट्स फसलों का पांचवां सबसे बड़ा निर्यातक है, लेकिन यहां उत्पादन ज्यादा है। राजस्थान बाजरा के क्षेत्र और उत्पादन, दोनों में अग्रणी राज्य है। विश्व खाद्य दिवस 2023 की थीम जल ही जीवन है, जल ही भोजन हैै। गौरतलब है कि अनेक मोटे अनाज की खेती कम पानी व विषम जलवायु में भी संभव है। इनका प्रचार बुनियादी रूप से भारतीय कृषि को मजबूत करेगा। अकेले ज्वार, बाजरा की ही सैकड़ों किस्में भारत में मौजूद हैं। जलवायु और जमीन के हिसाब से मोटे या पोषक अनाजों की खेती को बढ़ावा देने का कार्य युद्ध स्तर पर जारी है। ये अनाज गरीब राज्यों व किसानों के लिए ज्यादा कारगर हो सकते हैं, क्योंकि मोटे अनाज के उत्पादन में लागत कम आती है। ये फसलें मिट्टी की कमियों के प्रति भी कम संवेदनशील होती हैं तथा इन्हें कम जलोढ़ या लोमी मिट्टी में भी उगाया जा सकता है। इन्हें जल, उर्वरक और कीटनाशकों की भी न्यूनतम जरूरत पड़ती है। मोटे अनाज की खेती कार्बन फुटप्रिंट को भी कम करने में मदद करती है। मोटे अनाज से किसानों की सेहत भी सुदृढ़ हो सकती है। किसानों को इस बात से भी प्रेरित होना चाहिए कि मोटे अनाज की मांग दुनिया भर में बढ़ रही है। तमाम कृषि संस्थान किसानों को मोटे अनाज उत्पादन के लिए प्रेरित कर रहे हैं। मोटे अनाज का उत्पादन और निर्यात आने वाले वर्षों में तेजी से बढ़ना तय है।
