Thu, 08 06, 2026
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श्वेत संगमरमर से निर्मित गौड़ी पार्श्वनाथ मंदिर की नक्काशी मोहती है मन:

महमूद गजनवी ने प्रतिमा को तोडने का किया प्रयास, किन्तु हथोड़े के प्रहारों से भी प्रतिमा को नहीं हुई क्षति

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सांचौर नगर के शान्ति नगर कॉलोनी में पूर्वाभिमुख किए नगर का द्वितीय एवं चमत्कारी प्रतिमा धारी प्रसिद्धि प्राप्त शिखर सुशोभित 52 जिनालय युक्त गौडी पार्श्वनाथ 23वें तीर्थकर का भव्य मंदिर आया हुआ है।
श्री संघ ने इस मन्दिर का निर्माण विक्रम संवत 1100 में करवाया था। ऐसा उल्लेख जैन साहित्यों से मिलता है। मन्दिर में शोभायमान प्रभु का लघु पर आकर्षक बिम्ब 900 वर्षों से भी अधिक प्राचीन है। आज यह मन्दिर नगर के विशाल मंदिर रूप में है। इस मन्दिर के निर्माण में कच्छ वागड़ समुदाय के आचापदेव शान्तिचन्द्रसूरीश्वर के पट्टधर श्रीमद् विजय कनकप्रभसूरीश्वर का आशीर्वाद फलीभूत रहा है। इस मन्दिर की प्राण प्रतिष्ठा आज भी भूमण्डल की अन्य प्रतिष्ठाओं से किसी भी मुकाबले कम नहीं हैं।
पूरे मन्दिर में आबू देलवाडा जैसी नक्काशी व मीनाकारी है। पूरा मन्दिर सफेद संगमरमर पत्थर से निर्मित है। रात्रि के समय जब पूर्णिमा का चन्द्रमा यौवन पर हो तो इस मन्दिर की शोभा देखते ही बनती है। दूर से देखने पर पूरा मंदिर दूध से नहाया धवल दिखाई देता है।
मंदिर में स्थित प्रभु के चमत्कार पूर्ण वाकये आज भी देखने सुनने को मिलते है।
साधु भगवंतों के अनुसार आज भी देवी देवता इस चमत्कारी बिम्ब के दर्शनार्थ यहां आते है। मंदिर का एक चमत्कारी वाकया तो हाल ही घटित हुआ है। बताते है कि मूसलाधार बरसात के दौरान आकाशीय बिजली ने यकायक अपना स्थान छोड़कर मंदिर पर गिरी, लेकिन, मंदिर व बिम्ब को बिना क्षति पहुंचाए बिजली जमीन में समा गई।
इस घटना के अवशेष आज भी मंदिर में देखने को मिलते है। मंदिर परिसर में उपकारी गुरुवरों की देहरिया है व मंदिर के आगे कई धर्मशालाएं है। आगे के भाग में विशाल प्रांगण हैं।
जहां जैन समाज के आयोजन होते है। बाहर की तरफ मंदिर की पेढ़ी संचालित है। पास ही मंदिर में कार्यरत कर्मचारियों के आवास के लिए संस्था की ओर से कक्ष बने हुए है। यह मंदिर भी पंचाऊ मंदिर माना जाता है। श्वेत संगमरमर से निर्मित गौडी पार्श्वनाथ मंदिर की नक्काशी देखकर यहां आने वाले श्रद्धालु मोहित हो जाते है।
प्राचीन सत्यपुर जहां भगवान महावीर स्वामी के भाई ने स्थापित करवाई थी प्रतिमा
सांचौर वर्तमान सांचौर (प्राचीन सत्यपुर) को स्वामी प्रभु महावीर के कारण पहचाना जाता रहा है। जैन साहित्य एवं आदि कालीन साहित्यकारों के अनुसार भगवान महावीर की जीवित प्रतिमा क्षत्रिय कुण्ड के शासक एवं महावीर स्वामी के बड़े भाई नंदिवर्धन द्वारा स्थापित करवाई थी। प्रभु महावीर के प्रथम गणधर गौतम स्वामी ने अष्टापद तीर्थ पर चौबीस जिनेश्वरों का दर्शन वंदन करते समय अपने जग चिन्तामणी चैत्यवंदन में जयउ वीर सच्चउरी मण्डण कहकर सत्यपुर के अलंकार भूषण महावीर स्वामी प्रभु का जयघोष किया था। विक्रम संवत 1001 में महमूद गजनवी ने सोमनाथ मन्दिर को लूटकर लौटते समय सांचौर होते हुए सिंध की तरफ गया। उस समय उनके सैनिकों ने इस नगरमें विध्वंस किया था। जैनाचार्य जिनप्रभसूरि कृत विविध तीर्थ कल्प के अनुसार विक्रम संवत 1367 में अलाउद्दीन खिलजी गुजरात से सांचौर की तरफ आया। यहां के बहादुर सैनिकों व नागरिकों ने लोहा लिया, लेकिन सैन्य बल की कमी से असफल रहे। खिलजी ने मंदिरों को क्षति पहुंचाई व नगर की अतुल सम्पदा को लूटा। प्रभु की स्वर्णमयी प्रतिमा को अपने साथ ले गया। वीर संवत 660, विक्रम संवत 260 एवं शक संवत 125 में राजा नाहड द्वारा निर्मित भव्य एवं मन्दिर में उनके गुरु जज्जिगसूरि ने सर्वधातु सम्मिश्रित चमत्कारी प्रतिमा की प्रतिष्ठा करवाई थी। यह प्रतिमा भूगर्भ से निकली थी। जनश्रुति के अनुसार उस काल में एक गाय हमेशा एक ही समय एक स्थान पर दूध की धारा बहाती थी। साहित्यकार राकेश मनावत बताते है कि आचार्य जज्जिगसूरि से कही और उन्हीं के निर्देशानुसार उस स्थल पर खुदाई करने पर वीर प्रभु की पीतल की भव्य एवं चमत्कारी प्रतिमा निकाली। उसी प्रतिमा को राजा नाहड के द्वारा निर्मित मंदिर में वीर संवत 670 में प्रतिष्ठित किया गया। इस मंदिर का अधिष्ठायक देव ब्रह्मशान्ति नामक यक्ष था। कहते हैं कि सोमनाथ को लूटकर आते समय महमूद गजनवी ने सांचौर को लूटा तथा यहां के मन्दिरों को तोडा । उस समय इस प्रतिमा को तोडने का बहुत प्रयास किया गया, किन्तु हथोड़े के प्रहारों से भी वह प्रतिमा को तनिक भी क्षति नहीं पहुंचा सका। उसने बैलों व हाथियों के बल पर उस मूर्ति को चलायमान करने का प्रयास किया, लेकिन मूर्ति टस से मस नहीं हुई।
काफी प्रयास प हथोड़ों के भीषण प्रहार से वह मूर्ति की एक अंगूली को तोडऩे में सफल रहा। लेकिन उसी समय मुगल सेना पर भीषण देवीय विपदा आन पडी। सैनिकों के शिविरों में आग लग गई। इसी से त्रस्त हो उसने बिम्ब खण्डन का विचार त्याग किया व टूटी अंगूली पुन: उसी स्थान पर रख दी। जो अदृश्य चमत्कार से वापस जुड़ गई। बाद में अलाउद्दीन खिलजी ने अपने भतीजे व सेनापति उलू खां (उगलू खां) को भी मूर्ति तोडऩे के लिए भेजा, लेकिन वह भी असफल रहा। बाद में खिलजी स्वयं आया उसने मंदिर को अपवित्र किया तक अधिष्ठायक देव पलायन कर गए। उसने मंदिर को तोड़ उसे मस्जिद में तब्दील कर दिया व वीर प्रभु की प्रतिमा को दिल्ली ले गया।

 

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