अरावली की पहाड़ियों पर विलायती बबूल (जूली फ्लोरा) औषधीय पौधों का बैरी बना हुआ है। यहां विलायती बबूल ने जबरदस्त नुकसान पहुंचाया है। स्थिति यह है कि अधिकांश औषधीय पौधे खत्म होने के कगार पर है। उधर वन विभाग को जूली फ्लोरा हटवाने के लिए राज्य सरकार की स्वीकृति का इंतजार है। अरावली की पहाड़ियों पर वर्ष 1988 से 1992 तक वन विभाग ने अरावली परियोजना के तहत विलायती कीकर के पौधे लगवाए थे।
सेवानिवृत चिकित्सक डॉ. राघवेंद्र पाल ने बताया कि खेतड़ी के अरावली की पहाड़ियों में पहले दर्जनों औषधीय पौधे थे। इनमें सदाहरी, प्रसारिणी, भृंगराज (कला व सफेद) मकोय, शतावरी ,हिंगोनिया, अडूसा ,कंटकारी (पत्थर कटारी) तोरण सीरी (सत्यानाशी )झोझरु (सर्पणखा) रतवा ,बापूजी, पदम पवाड, नागर मोथ, धतूरा( काला व सफेद) अजमोद, गोखरू, वन तुलसी ,अपामार्ग ,आक ,खैर ,चिरमी, माल तांगनी, गिलोय, अमरबेल, सांभर बेल ,बिदारीकंद ,तेलिया कंद , खडूला, गंगेरण ,डांसर, गोरखमुंडी, सौनफूली, गुड़हल, कुरची, ककोड़ा, बाड़कोला, कुल्फा , बृजदंति, चिरायता, कुटकी ,बुई, इंद्रायण (गड़तुम्बा) सहित दर्जनों औषधीय पौधे मिलते थे। लेकिन विलायती बबूल के कारण इनमें अधिकांश पौधे नष्ट हो गए हैं।
वन विभाग वन क्षेत्र में जिस-जिस एरिया में वृक्षारोपण करवाता है। वहां पहले जेसीबी की सहायता से जूली फ्लोरा निकलवाता है। पूरे जंगल में जूली फ्लोरा निकलवाने के लिए राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजे हुए हैं। स्वीकृति आने पर जंगल से इनको हटावाया जाएगा।
विजय कुमार फगेड़िया, क्षेत्रीय वन अधिकारी खेतड़ी
वन्य जीव व पशुओं के लिए भी घातक बबूल का कांटा
बबाई के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. शिव कुमार सैनी ने बताया विलायती बबूल का कांटा कीलनुमा होता है। किसी वन्य जीव या पशु के पांव में यदि यह चुभ जाता है तो एक-दो दिन में ही उसमें पक कर मवाद पड़ जाती है। इससे पशु चलने फिरने में असमर्थ हो जाता है। विशेष कर वन्य जीव जिसमें पैंथर, चिंकारा,जरख, नील गाय इसमें इनका चलना फिरना बंद हो जाता है तथा शिकारी वन्य जीवों का शिकार बन जाते हैं।
