Thu, 08 06, 2026
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जठराग्नि की आंच में जलते बालमन के सपने:

छोटी उम्र में कलम -किताब छोड़ कचरे के बोरे थामने को मजबूर हुए मासूम

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जरूरतमन्द परिवारों के बच्चे दो जून की रोटी के लिए मेहनत करने निकलें तो उसे बाल मजदूरी कहकर अपराध बता दिया जाता है, वहीं बड़े घरानों के नन्हें बच्चे फिल्म उद्योग, टी वी सीरियल, विज्ञापन आदि में काम करके मोटी रकम कमाए तो उसे उपलब्धि माना जाता है। सरकार, प्रशासन व समाज की इस दोहरी नीति के चलते गरीब परिवारों के बच्चों को जीवनयापन व परिवार के लिए दो जून की रोटी के जुगाड़ में बस्तियों से दूर गन्दगी के ढेरों में कचरा बीनकर गुजारा करना पड़ता है। अभाव और गरीबी में उन्हें मजबूरीवश किताब और पेन कॉपी की जगह कोमल हाथों में कचरे के बोरे उठाने पड़ रहे हैं।
नहीं मिल पा रही शत प्रतिशत सफलता
अनिवार्य शिक्षा के अधिकार के साथ ही ड्रॉप आउट बच्चों को वापस स्कूल से जोड़ने के लिए सरकार विभिन्न कार्यक्रमों व अभियानों पर करोड़ों रुपए खर्च करती है। आरटीई के तहत भी निजी विद्यालयों को फीस पुनर्भरण के रूप में बड़ी राशि का भुगतान किया जाता है। इसके बावजूद योजना के धरातल पर प्रभावी मॉनिटरिंग व आरटीई में जुड़े विद्यार्थियों के विद्यालय परिवर्तन नहीं कर पाने के कारण आज भी कई बच्चे इसका फायदा लेने से वंचित रह जाते हैं।
पहले हो रोटी का जुगाड़
बाल मजदूरी को लेकर मासूमों ने बताया कि सरकार और विभिन्न संगठन बाल मजदूरी को अपराध तो सिद्ध कर देते हैं , लेकिन उनके परिवार की परेशानियों से सब अनजान बन जाते हैं। पहले उनके परिवार के लिए दो जून की रोटी कमाने का कोई जुगाड़ सरकार उपलब्ध करवाए और फिर बाल मजदूरी को विवश बच्चों को शिक्षा से जोड़े तो उनका सपना भी पूरा हो सकता है। अन्यथा दो चार दिन आगे पीछे घूमकर डंका तो बजा दिया जाता है, लेकिन परिवार के लिए रोटी के जुगाड़ में कोई बच्चा पढ़ नहीं सकता।
महंगी फीस और गरीबी बन रही अड़चन
शहर में कचरा बीन रहे दो बच्चों से पत्रिका ने उनकी मजबूरी जाननी चाही तो एक ने गरीबी व घर में कमाने वाला कोई नहीं होने के कारण बचपन से ही स्कूल नहीं जाना कारण बताया। दूसरे बालक ने पांचवीं तक पढ़ा होने व उसके बाद महंगी स्कूल फीस नहीं दे पाने के कारण स्कूल छोड़ना बताया।
पिता का साया उठते ही टूटा दुखों का पहाड़
कचरा बीन रहे एक मासूम ने बताया कि वह पढ़ लिखकर बड़ा आदमी बनना चाहता था। करंट लगने से उसके पिता की मौत हो गई। सिर से पिता का साया उठते ही परिवार पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। घर में कमाने वाला कोई नहीं होने व आय के अभाव में दो जून की रोटी के लाले पड़ने लगे तो स्कूल का बस्ता और बढ़ा आदमी बनने का सपना भूलकर कचरा बीनने का बोरा उठाना पड़ा।

 

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