Thu, 08 06, 2026
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मिट्टी के दीपों में फूंकते हैं जान, दीपावली पर घरों को करेंगे रोशन:

दीपक बनाना सिर्फ रस्म नहीं, परिवार की रोजी रोटी का जरिया

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शारदीय नवरात्र समापन के बाद अब दीपोत्सव पर्व की तैयारियां शुरू हो गई। घरों में साफ.-सफाई व रंग रोगन का कार्य शुरू कर दिए हैं। वहीं, मिट्टी में कलाकारी करने वाले कुंभकार अपनी परम्परा का निर्वाह करने में जुटे हुए हैं। शहर में मिट्टी में जान फूंककर अपनी दीपावली के लिए रोजगार करने वाले कुंभकार भी तैयारियों में लग गए हैं। वह अपने परिवार के साथ करवाचौथ के लिए करवा भी तैयार कर रहे है। जिन्हें मीना से सजा रहे हैं। प्रजापत समाज के लोग मिट्टी को आकार देकर दीपोत्सव की तैयारियों मे जुट गए हैं। क्योंकि दीपक बनाना इनके लिए सिर्फ रस्म नहीं बल्कि उनके परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति का जरिया है। यहां बात मिट्टी से निर्मित की गई कुछ खास चीजों की हो रही है जिनको दीपावली को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। आज से कुछ साल पहले तक मिट्टी से निर्माण किए गए दीपक सहित बर्तन, खिलौनों की खूब बिक्री हुआ करती थी लेकिन धीरे-धीरे इलेक्ट्रॉनिक एवं आधुनिक सामग्री ने बाजारों पर अपना एकाधिकार जमा लिया। लेकिन आज भी कुछ परिवार ऐसे हैं जिनके लिए यह सिर्फ रस्म नहीं है। बल्कि यह लोग आज भी इसे अपनी पूंजी मानकर अपने जीवन का अंधेरा दूर कर रहे हैं।
रोजगार का जरिया बन रही पुस्तैनी कला : शहर में दो दर्जन से ऐसे कई मिट्टी से कलाकारी करके उत्सव मनाने में जुट गए है। जो मिट्टी को नए-नए आकार देकर अपने परिवार का भरण पोषण करते हैं। नवरात्र का आरंभ होने के साथ ही पूरा परिवार दीपक बनाने के काम पर लग जाता है। इस तरह शुरू हो जाता है मिट्टी में जान फूंकने का सिलसिला। बाजार में इलेक्ट्रॉनिक सामग्री की बिक्री बढऩे से भले ही इन परिवारों की उत्पादन की बिक्री प्रभावित हुई हो इनकी आमदनी पर फर्क पड़ा हो, पर इनका हौसला अब भी बरकरार है। जिससे यह अपनी प्राचीन परंपरा को आज भी जीवित रखे हैं और दीये, करवा, मूर्ति, खिलौने आज भी बनाने में जुटे हैं।
कीमत कम पर महत्व अधिक
प्रजापत समाज कहना है कि वर्तमान समय में प्लास्टिक आदि के तरह-तरह के बर्तन आ गए हैं। इससे मिट्टी के बर्तनों की मांग कम है। इस काम में काफी मेहनत के बावजूद मुनाफा कम है। यही वजह है कि युवा पीढ़ी भी इस धंधा में नहीं आना चाहते है। चाक पर बने मिट्टी के छोटे दीये की कीमत 1 रुपया एक पीस की कीमत रखी है। वहीं एक सैंकड़ा दीये लेने पर 80 रुपए कीमत रखी है। चारमुखी और पंचमुखी दीये की कीमत 10 रुपए प्रति पीस तो उससे छोटे दीये की कीमत 5 रुपए प्रति पीस कुंभकारों ने रखी है।
कुंभकार बोले- आसान नहीं आकार देना
दीपक बनाने वाले दयाराम प्रजापत का कहना है कि मिट्टी को आकार देना आसान नहीं होता। हर साल दीपावली के पहले मिट्टी को महीन करना फिर गलाना, उसके कंकड़ साफ करना फिर चकरेे पर रखकर अलग-अलग आकार दिया जाता है। महंगाई के इस दौर में हर कोई सस्ता और अच्छा खरीदने की चाह रखता है। शुद्ध रूप से पीली मिट्टी से बनने वाले दीए की बात ही कुछ और है। वह और उनका परिवार सदियों से मिट्टी के दीपक बनाते आ रहे हैं।

 

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