Thu, 08 06, 2026
देश

कम अनुदान की मजबूरी, चारे के लिए जनसहयोग जरूरी:

9 माह का ही अनुदान देती है सरकार

post-img

प्रदेश में गोवंश के संरक्षण और संवर्द्धन के लिए सरकार 12 में से सिर्फ 9 माह ही अनुदान देती है। इतना ही नहीं अनुदान के तहत प्रति गोवंश दी जाने वाली राशि भी बढ़ती महंगाई के चलते नाकाफी साबित हो रही है। इस दोहरी दिक्कत से गोवंश और गौशाला संचालकों को काफी मशक्कत भी करनी पड़ती है। तीन वर्ष से कम आयु के गोवंश के लिए 20 रुपए और तीन वर्ष से अधिक आयु के गोवंश के लिए 40 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से अनुदान मिलता है। गोवंश के चारे के लिए यह अनुदान वर्ष में दो बार देने की व्यवस्था है। इसके तहत नवंबर, दिसंबर, जनवरी, फरवरी और मार्च में एक बार अनुदान दिया जाता है। दूसरी बार अप्रेल, मई जून और जुलाई माह में अनुदान की व्यवस्था है। यह अनुदान माह में 30 दिन के अनुसार देय है। पहली किश्त में 150 और दूसरी 120 दिन के हिसाब से अनुदान दिया जाता है। पर, अगस्त, सितंबर और अक्टूबर महीनों के लिए कोई अनुदान नहीं दिया जाता है।
देरी से मिलती है अनुदान राशि
गौ ग्राम सेवा संघ प्रदेश उपाध्यक्ष भुवन मुकुंद पंड्या ने बताया कि अनुदान बहुत कम मिल रहा है, जिससे गोवंश के चारे का संकट रहता है। जून से सितंबर तक चारे की समस्या आती है। अक्टूबर के बाद से नया चारा आने पर सस्ता होता है। अनुदान राशि न मिलने पर चारे का स्टॉक नहीं कर पाते। बीते वर्ष ही दिसंबर के अंतिम सप्ताह और जनवरी के पहले सप्ताह के बीच राशि मिली। लेकिन तब तक चारे का मौसम ही नहीं रहा।
तीन महीने चारे का संकट, बढ़ जाते हैं भाव
गौ ग्राम सेवा संघ के कार्यकारी प्रदेशाध्यक्ष सूरजमाल ङ्क्षसह नीमराना ने बताया कि जिन तीन माह में सरकार अनुदान नहीं देती है, ये वो समय है जब चारे का संकट रहता है। बाजार में चारे की काफी कमी हो जाती है। तकरीबन 10 रुपए किलो मिलने वाले चारे के भाव डेढ गुने तक हो जाते हैं, जो गोशाला संचालकों के लिए मुश्किल खड़ी कर देते हैं। सरकार से मांग है कि चारे की काला बाजारी बंद करने के लिए ठोस कदम उठाए और चारे को खाद्य सुरक्षा अधिनियम और आवश्यक वस्तु अधिनियम में शामिल किया जाए। पशु खाद्य योग्य चारा ईंट भट्टों आदि उद्योगों में भी जलाने के लिए उपयोग में लिया जाता है। इसकी रोकथाम के लिए सख्त कानून बनाए जाएं। ताकि चारे के मूल्य पर अंकुश लग सके।
गोवर्द्धन गौशाला अध्यक्ष जयंत द्विवेदी बताते हैं कि अनुदान राशि कम होने के कारण चारे के लिए जनसहयोग लेना पड़ता है। तभी गो वंश की खुराक पूरी हो पाती है। गांवों में जाकर किसानों से चारा लेते हैं। लोग गौशाला में चारा खिलाने के लिए सहयोग भी करते हैं। जन सहयोग न हो तो गायों का पेट भरना तक संभव नहीं है। अनुदान राशि बढ़ाना बेहद जरूरी है।

 

Related Post