जहाजपुर कस्बे में मां घाटारानी के दरबार में दूर-दूर से भक्त मुरादें लेकर आते हैं, कई पदयात्रा करके पहुंचते हैं तो कईयों की लोटन यात्रा होती है। मान्यता है कि मां सब की मुरादें पूरी करती है। मुरादें पूरी होने पर कई भक्त अपनी श्रद्धा अनुसार दान दक्षिणा भी चढाते हैं, जबकि कई यहां माता के चरणों में वंदन के बाद त्रिशूल चढ़ाते हैं। पुजारी शक्तिसिंह तंवर बताते हैं कि यहां मंदिर में सैंकडों भक्त लोहे के त्रिशूल चढ़ा चुके हैं। इनमें कुछ त्रिशूल पीतल व अन्य धातु के भी है। इनकी लम्बाई दो फीट से लेकर इक्यावन फीट तक हैं। वह बताते हैं कि यहां कईयों ने मुराद पूर्ण होने पर पीतल के घंटे भी बांधे हैं। यहां साल भर भक्तों की आवाजाही रहती है। क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि मेवाड़ में संभवत: घाटारानी माता का एक मात्र मंदिर है, जहां शारदीय एवं चैत्रीय नवरात्र के दौरान प्रथम सात दिन माता की मूर्ति के सामने पर्दा रहता है। नवरात्र की अष्टमी के तड़के महाआरती के बाद ही यह पर्दा हटता है।
