शहर की कभी पनघट रही बावड़िया अब बदहाल पड़ी है। पनघट की चहल-पहल की जगह कबूतरों की गुटर-गूं सुनाई देती है। कभी शहर की गढ़ की बावड़ी व शम्भूबाग की बावड़ी कस्बे की प्यास बुझाती थी। भीषण अकाल के समय भी नहीं सूखने वाली धरोहरों को भी कचरा पात्र बना डाला है। बावडियों में पानी कम और कचरा अधिक भरा पड़ा है। कहते है जो जलस्रोत काम नहीं आता उससे बिसरा दिया जाता है। ऐसा ही नैनवां कस्बे की बावड़ियों के साथ हो रहा है। इन धरोहरों का भी अब कोई धणी-धोरी नहीं रहा। पहले ही नैनवां के तालाब की पाल पर स्थित पांच सौ वर्ष पुरानी बावड़ी तालाब में समा चुकी है। नैनवां को बसाने वाले किलेदार नाहर खानसिंह ने तालाब सूखने पर लोगों के नहाने की सुविधा के लिए गढपोल दरवाजे के पास कनकसागर के किनारे तथा चौपरज्या में नवलसागर के किनारे कुण्डो का भी निर्मूाण कराया था। पांच सदी पुराने इन कुण्डों को भी संरक्षण नहीं मिल पाया। दोनों ही कुण्डों की आधी से ज्यादा सीढिय़ा तो कचरे से अटी पड़ी है।
गढ की बावड़ी
गढ की बावड़ी में मीठा पानी होने के बाद भी कचरा डालकर दूषित कर दिया। जबकि जब-जब भी पानी का संकट हुआ यही बावड़ी संकट मोचक बना करती थी। कभी पूरे कस्बे की प्यास बुझाने वाली रियासतकालीन गढ की बावड़ी को संवारने के बजाय कचरा पात्र बना डाला। बावड़ी दो दशक पूर्व तक आधे कस्बे का पनघट हुआ करती थी। आज भी इसमें अथाह पानी है। जब से जलप्रदाय योजना शुरु हुई और लोग नलों पर निर्भर कर दिए उसके बाद तो कूड़ादान बनाकर मीठे पानी भी प्रदूषित कर डाला। बावड़ी भी कस्बे के लोगों के लिए पेयजल का प्रमुख स्रोत हुआ करती थी। 1985 में नैनवां में जलप्रदाय योजना स्वीकृत हुई थी तब तक आधा कस्बा इसी बावड़ी से प्यास बुझाया करता था। बीस वर्ष तक कस्बे की प्यास बुझाने के बाद नैनवां को पाईबालापुरा पेयजल योजना से जलापूर्ति होने लगी तो बावड़ी की सुध लेना ही छोड़ दिया। बावड़ी में धीरे-धीरे मलबा भरता जा रहा है जिसको निकालने वाला कोई नहीं है। कूड़ादान बनाकर मीठे पानी भी प्रदूषित कर डाला।
शम्भूबाग की बावड़ी
शम्भू बाग में पांच सदी पुरानी बाग की बावड़ी को भी संरक्षण नहीं मिल पाया। बावड़ी को संरक्षण की दरकार है। तीन खंड की बनी बावड़ी में शिल्प कला का भी नमूना है। बाड़ी के अन्दर झरोखों में एक ही पत्थर से बनी हाथी की प्रतिमाएं, सीढियों के पत्थरों पर हो रही शिल्प कला मोहित करती थी। बावड़ी में लबालब भरी है, लेकिन पानी के ऊपर कूड़ा-करकट जमा होने से पानी का उपयोग नही हो पा रहा। बावड़ी से जलदाय विभाग दो दशक तक कस्बे में जलापूर्ति करता था। जब से नलकूपों का जमाना आया तो जलदाय विभाग ने बावड़ी का पानी लेना बंद कर दिया। उस दिन से ही बाग की बावड़ी भी बदहाल होती चली गई।
