अब यहां ना नृत्य है। ना ही संगीत का नजराना। सुरों की महफिल के साथ घुंघरुओं की खनक थम गई है। ख्याल, बंदीश और राग अब बीते जमाने की बात हो गई है। वाद्य यंत्रों की आवाज से गुलजार रहने वाला चूरू अब खामोश सा हो गया है। वीणा, तानपुरा, हारमोनियम, सारंगी अब कभी कभार ही दिखाई देते हैं। क्योंकि यहां के संगीत को ना सियासत आगे बढ़ा सकी और ना ही फनकार। एक जमाना था जब चूरू मण्डल संगीत साधना का मुख्य केन्द्र बिंदू था।
आजादी से पहले ही तिरंगा फहराने वाले चूरू संगीत कला का क्षेत्र इतना सशक्त था कि इसकी फिल्म जगत में धाक रही। सन् 1944 में संगीताचार्य प्रो.जयचंद शर्मा ने यहां चूरू संगीत प्रशिक्षणार्थ संगीत कॉलेज की जैन मार्केट में स्थित बालाजी मंदिर में स्थापना की थी।दो बनें कमरों में शुरू हुई यह कॉलेज पांच दशकों की यात्रा करते यूं गायब हो गया, जैसे ऑल इण्डिया संगीत कॉलेज जैसे कभी इसका अस्तित्व ही नहीं रहा हो। तभी से संगीत के क्षेत्र में आई शून्यतां की वर्तमान तक कोई भरपाई भी नहीं कर पाया है।
कला के इस मंदिर का रहा है बड़ा मुकाम
सुधाकर यति, सत्यनारायण ओझा, बालजी दमामी जैसे संगीतज्ञों के साथ प्रो.जयचंद शर्मा ने संगीत कला को यहां से बड़ा मुकाम दिया। इसके बाद चूरू में ऑल इण्डिया संगीत कॉलेज विधिवत रूप से वर्ष 1962 से मालजी के कमरे में स्थित दो कमरों के भवन में सुचारू रूप से चलने लगी। जयचंद शर्मा बाद में चूरू से बीकानेर चले गए। इस दौरान रामेश्वरलाल कत्थक सबसे ज्यादा प्रशिक्षण देने वाले प्रथम गुरु रहे। मांगीलाल कत्थक, परमेश्वर नाई ने संगीत का लम्बे समय तक प्रशिक्षण दिया। संस्था के पहले अध्यक्ष संगीताचार्य पं.मुरलीधर शर्मा रहे। बाद में श्यामसुन्दर बगडिय़ा ने दायित्व संभाला। रामलाल पत्रकार, माधव शर्मा, गंगाधर पाठक, शोभाराम बणीरोत आदि ने संस्था को समय-समय पर संभाला।
राजस्थान संगीत एकेडमी से मान्यता
ऑल इण्डिया संगीत कॉलेज चूरू को 1953 में राजस्थान संगीत अकादमी से मान्यता मिली। उस समय संगीत कॉलेज पुजारी भवन में चल रहा था। संस्था के अध्यक्ष रहे पं.मुरलीधर शर्मा और उपाध्यक्ष ममाराज स्वामी सहित करीब दस जनों का स्टॉफ था। संगीतज्ञ सुधाकर यति हॉरमोनियम पर, जुगल खां, हमीर खां व सत्यनारायण ओझा तबला और मृदंग आदि वाद्य यंत्रों का प्रशिक्षण दिया करते थे।
हुआ पंजीयन मिला अनुदान
सन 1962 के करीब संस्था का पंजीयन हुआ और गंधर्भ महाविद्यालय से सम्बद्ध बने चूरू ऑल इण्डिया संगीत कॉलेज को राज्य सरकार की मान्यता मिली। सरकारी मान्यता मिलने के साथ ही संगीत की यह चूरू पहली अनुदानित संस्था बन गई। जबकि दूसरी ओर इसके संस्थापक रहे जयचंद शर्मा ने बीकानेर जाकर संगीत भारती की स्थापना की, लेकिन चूरू के संगीत कॉलेज के विकास के लिए वे निरंतर प्रयत्नशील रहे।
गायन के साथ मिलता था नृत्य का प्रशिक्षण
संगीत कॉलेज डिग्री कॉलेज तो रहा, लेकिन शीथलता आने पर एक बार फिर जयचंद शर्मा को बुलाया गया। वे संगीताचार्य डॉ.श्यामसुन्दर शर्मा को चार्ज देकर चले गए और जयचंद शर्मा के पुत्र मुरारीलाल शर्मा चूरू रहकर विद्यार्थियों को नृत्य का प्ररशिक्षण देने लगे। बाद में वे भी चूरू से बीकानेर चले गए। डॉ.शर्मा ने पत्रिका से बातचीत करते हुए बताया कि गायन और नृत्य विद्या के क्षेत्र में यह नामचीन कॉलेज रहा। अनेक कलाकारों ने नृतक में महारथ हासिल की और इस कॉलेज से कत्थक घराने जुड़े। कॉलेज में संगीत भूषण, संगीत विरासत और संगीत रत्न कोर्स थे। इस परीक्षाओं को उतीर्ण करनेवाले डिग्री धारक बनतें और उन्हें उपाधि मिल जाया करती थी।
अस्सी के दशक में खामोश हुआ संगीत कॉलेज
पांच दशक तक अनुकूल और विपरीत परिस्थितियों में चले ऑल इण्डिया संगीत कॉलेज को अंतिम वर्षों में मांगीलाल कत्थक आचार्य थे, जिन्होंने लम्बे समय तक प्रशिक्षण दिया। इस दौरान कॉलेज संचालित करने में अनेक समस्याए आई और अस्सी के दशक में कॉलेज बंद हो गया। इसके साथ चूरू में संगीत साधना के एक युग का अवसान सा हो गया। बाद में इसके शुरू करने का कभी प्रयास भी नहीं किया गया। आज कॉलेज का अस्तित्व भी नहीं है, जबकि संगीत कला का विशेषज्ञ रहा, लेकिन आज पुराने संगीतज्ञ इस दुनियां में नहीं है।
