Thu, 08 06, 2026
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नारी शक्ति: 500 आदिवासी महिलाएं सब्जी बेच चल रहीं घर:

मेहनत का दामन, बदल रहीं किस्मत : बांसवाड़ा शहर में फुटकर सब्जी विक्रेताओं में 85 फीसदी महिलाएं

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आज दुर्गा नवमी है। नारी को शक्ति के रूप में पूजने का दिन है। क्यों किसंघर्ष हो या मेहनत, या हो जीवन की कोई भी परीक्षा, नारी शक्ति ने हमेशा ही स्वयं को बेहतर साबित किया है।
बांसवाड़ा में नारी शक्ति के संघर्ष और अपनों के लिए समर्पण की बानगी देखने को मिल रही है। यहां शहर के आसपास 20 से अधिक गांवों की तकरीबन 500 आदिवासी महिलाएं परिवार के भरण पोषण के लिए संघर्षरत हैं। यहां तक की इन बांसवाड़ा शहर के फुटकर सब्जी विक्रेताओं में तकरीबन 85 फीसदी महिलाएं ही हैं। इनमें कुछ महिलाएं आदिवासी समाज से नहीं हैं। जब पत्रिका टीम ने शहर की लोकल मार्केट को खंगाला तो यह तथ्य सामने आया। इनके अतिरिक्त कई महिलाएं ऐसी भी हैं जो सब्जी की खेती में परिवार का पूरा सहयोग कर रही हैं।
कई घंटों की मेहनत, बनी किसान और व्यापारी
इन गांवों की महिलाओं ने स्वयं को सिर्फ खेतों में मेहनत तक ही सीमित नहीं किया बल्कि उगाई गई सब्जियों को बेचकर स्वयं को व्यापारी के रूप में भी प्रस्तुत किया। सब्जी की खेती करने वाली रीना निनामा , हंतो मईड़ा, सुरता निनामा, कमली चरपोटा, उर्मिला कटारा, शांति पारगी अन्य कई महिलाएं बताती हैं कि सूर्योदय के पहले उठ कर वे बांसवाड़ा में सब्जी बेचने के लिए निकल जाती हैं। दोपहर बाद सब्जी नहीं बिकती है तो मोहल्लों में फेरी लगाती हैं और बिकने के बाद ही घर लौटती हैं। वहां से लौटकर अकेले या परिवार के सदस्यों के साथ खेत में सब्जी तोडऩे का काम करती हैं। ताकि दूसरे दिन सब्जी बेचने के लिए तैयारी कर सकें। फसल बोने के दिनों में काम और बढ़ जाता हैं। कुछ महिलाएं थोक बाजार से सब्जी खरीद कर भी बेचती हैं।

आने का समय है पर जाने का नहीं
झांतला गांव की कमला कटारा बताती हैं कि वो रोज सुबह चार बजे उठती हैं। पहले खेतों में काम कर सब्जी तोड़ते हैं। फिर बच्चों के लिए खाना बनाकर तकरीबन आठ बजे तक बाजार पहुंच जाते हैं। जब तक सब्जी नहीं बिकती तब तक बाजार में रहते हैं। फिर चाहें दोपहर के दो बज जाएं या शाम के चार। मेरे काम करने से परिवार को आर्थिक संबल मिल जाता है।
पूरे दिन बैठते धूप में, 40 वर्षों से कर रहे व्यापार
गणपतपुरा की मीरा पारगी बताती हैं कि वे बीते 40 वर्ष से सब्जी का काम करती हैं। गर्मी हो बारिश या सर्दी उन्हें तो छतरी भी नसीब नहीं है। हमारे लिए तो कोई छुट्टी भी नहीं। याद भी नहीं कि आराम के लिए कभी काम न किया हो।

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